Mere Baad…. Paperback – 1 Jan 2019 by Rahat Indori (Author)

Rs.115.00Rs.125.00

  • Paperback: 91 pages
  • Publisher: Radhakrishna Prakashan (1 January 2019)
  • Language: Hindi
  • ISBN-10: 8183618219
  • ISBN-13: 978-8183618212
  • Package Dimensions: 21.3 x 14 x 0.8 cm
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About the Author

डॉ. राहत इन्दौरी का जन्म 1 जनवरी, 1950 को इंदौर में श्री रिफतुल्लाह और मकबूल बी के घर में हुआ ! उन्होंने उर्दू में एम्.ए. और पी-एच.दी. करने के बाद इंदौर विश्वविद्यालय में सोलह वर्षों तक उर्दू साहित्य अध्यापन और त्रैमासिक पत्रिका ‘शाखें’ का 10 वर्षों तक संपादन किया ! पचास से अधिक लोकप्रिय हिंदी फिल्मों एवं म्यूजिक अल्बमों के लिए गीत लेखन कर चुके हैं तथा सभी प्रमुख गजल गायकों ने उनकी गजलों को अपनी आवाज दी है ! अब तक उनके छः कविता-संग्रह प्रकाशित और समादृत हो चुके हैं ! पिछले 40-50 वर्षों से लगातार देश-विदेश के मुशायरों और कवी-सम्मेलनों में शिरकत ! अब तक अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, सिंगापूर, मोरिशस, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, ओमान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल आदि अनेक देशों की अनेकानेक यात्राएँ कर चुके हैं और देश-दुनिया के दर्जनों पुरस्कारों से सम्मानित हैं ! सम्पर्क : पोस्ट बॉक्स 555, इन्दौर।

Description

गहरी से गहरी बात को आसानी से कह देने का जटिल हुनर जाननेवाले राहत भाई से मेरा बड़ा लम्बा परिचय है। मुशायरे या कवि-सम्मेलन में वे कमल के पत्ते पर बूँद की तरह रहते हैं। पत्ता हिलता है, झंझावात आते हैं, बूँद पत्ते से नहीं गिरती। कई बार कवि और शायर कार्यक्रम शुरू होने से पहले मंच पर आसन जमा लेते हैं, लेकिन इस नए कॉरपोरेट ज़माने में चूँकि कवि-सम्मेलन या मुशायरा एक शो या इवैंट की तरह हैं, तो शुरुआत से पहले आमतौर से शायर हज़रात मंच के पीछे खड़े रहते हैं। नाम के साथ एक-एक करके उनको पुकारा जाता है, तब मंच पर आते हैं। जिस शायर के लिए खूब देर तक खूब सारी तालियाँ बजती रहती हैं, उनका नाम है राहत इन्दौरी। एक अध्यापक जैसे सादा लिबास में वे आते हैं, जो बिलकुल शायराना नहीं होता। तालियों के प्रत्युत्तर में वे हल्का सा झुककर सामईन को आदाब करते हैं और बैठने के लिए अपनी सुविधा की जगह देखते हैं, वैसे उन्हें पालथी मारकर बैठने में भी कोई गुरेज़ नहीं होता। एक बेपरवाही भी शाइस्तगी के साथ मंच पर बैठती है, जब राहत भाई बैठते हैं। आमतौर से हथेली को गद्दे से टिका देते हैं। मैं कई बार उनके गाढ़े साँवले सीधे हाथ को, जिसको वे टिकाते हैं, देर तक देखता रहता हूँ, उसकी अँगूठियों को निहारता हूँ और उँगली अँगूठे के पोरों को देखता हूँ कि कितनी खुश होती होगी वह $कलम जब इस हाथ से अशआर निकलते होंगे। ऐसे अशआर जिनकी जि़न्दगी बहुत तवील है, बहुत लम्बी है। राहत साहब जब माइक पर आते हैं तो लगता है कि ये ज़मीन से जुड़ा हुआ आदमी कुछ इस तरह खड़ा है कि ज़मीन खुश है और वो जब हाथ ऊपर उठाते हैं तो लगता है कि आसमान छू रहे हैं। वे तालियों से बहुत खुश हो जाएँ या अपने अशआर सुनाते वक्त तालियों की अपेक्षा रखें, ऐसा नहीं होता। उनका अन्दाज़, उनके अल्फाज़, उनकी अदायगी, ज़बान पर उनकी पकड़, उनकी आवाज़ का थ्रो, उनके हाथों का संचालन, माइक से दूर और पास आने की उनकी कला, शब्द की अन्तिम ध्वनि को खींचने का उनका कौशल, एक पंक्ति को कई बार दोहरा कर सोचने का समय देने की होशियारी, एक भी शब्द कहीं ज़ाया न हो जाए इसकी सावधानी, न कोई भूमिका और न उपसंहार, अगर होते हैं तो सिर्फ और सिर्फ अशआर। बहुत नहीं सुनाते हैं, लेकिन जो सुना जाते हैं, वह कम नहीं लगता। क्योंकि वे जो सुना गए, उस पर सोचने के लिए कई गुना वक्त ज़रूरी होता है। वे सामईन को स्तब्ध कर देते हैं। वे अपने जादू की तैयारी नहीं करते, लेकिन जब डायस पर आ जाते हैं तो उनका जादू सिर चढ़कर बोलता है। राहत इन्दौरी का होना एक होना होता है। वे अपनी निज की अनोखी शैली हैं, दुनिया-भर के सैकड़ों शायर उनका अनुकरण करते हैं, लेकिन सिर्फ कहन की शैली से क्या होता है, शैली के पीछे सोच और समझ का व्यापक भंडार भी तो होना चाहिए। ‘जुगनुओं ने फिर अँधेरों से लड़ाई जीत ली, चाँद, सूरज घर के रौशनदान में रखे रहे’ ये शेर ये बताता है कि उनके अन्दर इतना हौसला है कि कायनात से चाँद-सूरज को उठाकर वे अपने रौशनदान में रख सकते हैं। रौशनदान दोनों तरफ उजाला करता है। घर के अन्दर भी और घर के बाहर भी। अगर वे सूरज, चाँद हैं तो। मुझे लगता है कि राहत इन्दौरी एक रौशनदान हैं, जो आभ्यन्तर लोक को भी दैदिप्यमान करते हैं तो बहिर्लोक को भी चुंधिया देते हैं। बहुत लम्बी चर्चा की जा सकती है राहत भाई के बारे में वो कवि-सम्मेलनों और मुशायरों के लिए एक राहत हैं, एक धरोहर हैं क्योंकि वे सामईन की चाहत हैं। मैं दुआ करता हूँ कि राहत भाई कवि-सम्मेलन और मुशायरों को स्तरीय बनाए रखने में अपना योगदान दीर्घकाल तक देते रहें…! —अशोक चक्रधर

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